Sunday, August 28, 2016

Alsi Maa Ki Arti (Goddess Linseed Prayer)

अलसी से वात, पित्त, कफ सभी विकारों का इलाज होता है। इस औषधि को नवरात्रि में माता स्कंदमाता को चढ़ाने से मौसमी बीमारियां नहीं होती। साथ ही स्कंदमाता की आराधना के फल स्वरूप मन को शांति मिलती है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी है। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती है।
अलसी के संबंध में शास्त्रों में कहा गया है.
अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।
अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।
उष्णा दृष शुक वातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।
अर्थात् वात, पित्त, कफ जैसी बीमारियों से पीडि़त व्यक्ति को स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए और माता को अलसी चढ़ाकर प्रसाद में रूप में ग्रहण करना चाहिए। प्रस्तुत है अलसी मां की आरती .....


अलसी वंदना
आरती अलसी मैया की
शशिधर रूप दुलारी की ।।
स्वास्थ्य की देवी कहलाती
भक्त की पीड़ा हर लेती
मोक्ष के द्वार खोल देती
शत्रु हो त्रस्त
रोग हो ध्वस्त
देह हो स्वस्थ
दयामयी अनुरागिनी की
शशिधर रूप दुलारी की ।।
त्वचा में लाये कोमलता
कनक जैसी हो सुन्दरता
छलकता यौवन का सोता
बदन में महक
केश में चमक
मुखाकृतिें दमक
मोहिनी नील कुमारी की
शशिधर रूप दुलारी की ।।
तुम्हीं हो करुणा का सागर
कृपा से भर दो तुम गागर
धन्य हो जाऊँ मैं पाकर
तू देती शक्ति
करूँ मैं भक्ति
दिला दे मुक्ति
उज्ज्वला मनोहारिणी की
शशिधर रूप दुलारी की ।।
ज्ञान और बुद्धि का वर दो
तेज और प्रतिभा से भर दो
ओम को दिव्य चक्षु दे दो
न जाऊं भटक
बिछाऊं पलक
दिखादे झलक
रुद्र प्रिय मतिवाहिनी की
शशिधर रूप दुलारी की ।।
क्रोध मद आलस को हरती
हृदय को खुशियों से भरती
चिरायु भक्तों को करती
मची है धूम
मन रहा घूम
भक्त रहे झूम
स्कंद मां पालनहारी की
शशिधर रूप दुलारी की ।।

Tuesday, July 19, 2016

असंभव को संभव बनाता - ओरीगानो तेल


    वाइल्ड ओरीगानो एक सदाबहार पौधा है। इसका बोटेनिकल नाम Origanum Vulgare है। इसकी पत्तियां जैतून के जैसी हरी और फूल छोटे और बैंगनी रंग के होते हैं। पूरे पौधे में एक विशेष तरह की तेज गंध होती है और इसका स्वाद तेज, गर्म और हल्का कड़वा होता है। सूखे पौधे, पत्तियों, बीज और तेल में भी यही खास गंध होती है, जो इसकी पहचान है। बाजार में मिलने वाली अजवायन स्वीट मार्जोरम या मेक्सीकन सेज होती है, जिनमें कोई औषधीय गुण नहीं होते। 
    वैसे तो ओरीगानो की 40 प्रजातियां होती है, लेकिन चमत्कारी औषधीय गुण सिर्फ मेडिटेरेनियन के पहाड़ों में उगने वाली वाइल्ड ओरीगानो (Origanum Vulgare) में ही होते हैं। तेल निकालने के लिए सही समय पर फूल और पत्तियों को तोड़ लिया जाता है, जब पौधे में तेल की मात्रा सबसे अधिक होती है। प्राचीनकाल में ग्रीस और इटली के लोग ओरीगानो को बहुत पसंद करते थे। पिज़्जा और अन्य व्यंजनों में ओरीगानो का भरपूर प्रयोग किया जाता था। ओरिगेनम (Origanum) शब्द भी दो ग्रीक शब्दों ओरोज (oros=mountain) और गेनोज (ganos=joy) से लिए गए हैं। इनका मतलब है पहाड़ों का आनंद (joy of the mountain) । ओरीगानो को आनंद का प्रतीक माना जाता है। पुराने जमाने में वहाँ नव विवाहित जोड़े को ओरीगानो का ताज पहनाने का रिवाज़ था। 

ओरीगानो तेल – पोषक तत्वों का मधुबन 

    कार्वेक्रोल – ओरीगानो के तेल का सबसे अहम तत्व कार्वेक्रोल नामक एक मोनोटर्पेनॉयड फीनोल है, जो इस पूरी
कायनात का सबसे तेज़ और असरदार मल्टी-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक है। ईश्वर द्वारा दिए गए इस अनूठे फीनोल में केंडिडा ऐल्बीकेंस, स्टेफाइलोकोकस, ई-कोलाई, केंपाइलोबेक्टर, सोलमोनेला, क्लेबसिएला, ऐस्परगिलस मोल्ड, जिआर्डिया, सूडोमोनास और लिस्टेरिया समेत 90 से अधिक रोगाणुओं को नष्ट करने की क्षमता होती है। ओरीगानो तेल में कार्वेक्रोल और थायमोल की मात्रा 80% तक होती है। कार्वेक्रोल की भेदन क्षमता बड़ी तेज़ होती है और यह लेज़र किरणों की तरह टिशूज़ को चीरता हुआ गहराई तक पहुच कर असर दिखाता है। 
    थायमोल – यह एक प्राकृतिक कॉक्स-2 इन्हिबीटर है और एक तेज़ दर्द-निवारक है। यह फंगस और कीटाणुरोधी है। यह इम्युनिटी को बढ़ाता है, टॉक्सिंस से शरीर की रक्षा करता है, कोशिकाओं को नष्ट होने से बचाता है और उपचार प्रक्रिया को प्रोत्साहित करता है। 
    टरपीन्स – शक्तिशाली एंटीबेक्टीरियल है। 
    रोज़मरीनिक एसिड – यह एक एंटीऑक्सीडेंट है और अस्थमा, कैंसर और ऐथेरोस्क्लिरोसिस के उपचार में मदद करता है। यह प्राकृतिक एंटीहिस्टेमीन है और ऐलर्जी से होने वाले तरल के जमाव और सूजन को कम करता है। 
    नरायंगिन – कैंसररोधी है और तेल की एंटीऑक्सिडेंट क्षमता को बढ़ाता है। 
   बीटा-करायफीलिन (E-BCP) – यह प्रदाहरोधी है और ऑस्टियोपोरोसिस, ऐथेरोस्क्लिरोसिस और मेटाबोलिक सिंड्रोम के उपचार में मदद करता है। 
    ओरीगानो के तेल में विटामिन ए, सी और ई, कैल्सियम, मेग्नीसियम, जिंक, आयरन, पोटेसियम, मेंगनीज़, कॉपर, बोरोन, और नायसिन भी पर्याप्त मात्रा में होते हैं। 

कैंसर रोगी को राहत 

    ओरीगानो तेल कैंसर के हॉलिस्टिक उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भले ओरीगानो तेल अकेले कैंसर को ठीक नहीं कर सके लेकिन यह हर कैंसर उपचार को प्रोत्साहित करता है और कैंसरजनित दर्द, प्रदाह और संक्रमण में राहत दिलाता है। 

जोड़ की तकलीफ़ो में चमत्कार

    आर्थराइटिस एक कष्टप्रद चिरकारी रोग है, जिसके प्रमुख लक्षण जोड़ों में दर्द, सूजन, प्रदाह और जकड़न होते हैं। ओरीगानो तेल जोड़ों में गहराई तक जाकर दर्द, प्रदाह और जकड़न को दूर करता है। यह प्रदाह से सुलगते जोड़ों और मांस-पेशियों को त्वरित गति से शांति और सुकून पहुँचाता है और खोई हुई लचक प्रदान करता है। 
कार्वेक्रोल शरीर की प्राकृतिक प्रदारोधी प्रणाली हीट शॉक प्रोटीन्स (heat shock proteins) को सक्रिय करता है, सेल्फ-स्ट्रेस प्रोटीन्स को निष्क्रिय करने वाले टी-सेल्स की क्षमता को बढ़ाता है और प्रदाह को शांत करता है। 

दर्द निवारक 

    ओरीगाने तेल निसंदेह बहुत शक्तिशाली दर्द निवारक है। यह मोर्फीन के इंजेक्शन की तरह तेजी से दर्द दूर करता है, लेकिन इसकी आदत नहीं पड़ती और कोई साइड-इफेक्ट भी नहीं हैं। यह अन्य दर्द निवारक दवाओं से भी बढ़कर दर्द और प्रदाह को ठीक कर देता है। 

चिकित्सकीय प्रयोग 

त्वचा के रोग -
वायरल इंफेक्शन - हरपीज़ जोस्टर, कोल्ड सोर्स (हरपीज़ सिंप्लेक्स)
बेक्टीरियल इंफेक्शन – फोड़े-फुंसी
फंगल इंफेक्शन – रिंगवर्म, सेबोरिया, जेनीटल वार्ट, इंपेटायगो, डर्मेटायटिस, सोरायसिस, एग्ज़ीमा, रोज़ेसिया, एक्ने,
एथलीट्स फूट, जोक इच, चोट, घाव, ऐलर्जिक रेश, स्केबीज़, बैड सोर
जलने या चोट के घाव, खंरोच (एंटीबायोटिक, एंटीसेप्टिक और दर्द निवारक) 
ओरीगानो तेल सबसे शक्तिशाली एंटीबायोटिक है। चोट लगने या जलने के घाव को साफ करने के लिए और दर्द दूर करने के लिए घाव पर तुरंत तेल लगाएं। इससे हल्के-फुल्के जलने या चोट के घावों में फफोले नहीं बनेंगे और घाव के निशान भी नहीं रहेंगे। इंफेक्शन भी नहीं होगा और घाव जल्दी भर जाएंगे। 
सर्पदंश या बिच्छू डंक (एंटीवेनम)
सांप, बिच्छू या कोई भी ज़हरीले कीड़े मकोड़े के काटने पर तुरंत ओरीगानो तेल लगाना चाहिए। यह ज़हर को निष्क्रिय करता है और शीघ्रता से घाव को भेदता हुआ अंदर जाता है। इसकी प्रदाहरोधी और चेतनाशून्य शक्ति टॉक्सिंस और रोगाणुओं को निष्क्रिय करती है ओर दर्द और वेदना में तुरंत राहत दिलाती है। इसकी 2-4 बूंदे पानी में मिला कर लेने से ज़्यादा फायदा मिलता है। 
श्वास रोग
कार्वेक्रोल H5N1 बर्ड फ्लू (इंफ्लुएंजा-ए वायरस की एक प्रजाति), खांसी, सायनुसायटिस, ब्रोंकायटिस, गले की ख़ारिश, सर्दी, ज़ुकाम आदि में राहत देता है। यह बलग़म को बाहर निकालता है। इसकी भाप को लेने से फेफड़ों को सुकून मिलता है और खासी में फ़ायदा होता है। 
पेरासाइट इंफेक्शन – (जैसे सिर की जुएं, स्केबीज़, क्रिप्टोस्पोरीडियम, जिआर्डिया, फ्लूक्स) 
पेट के कीड़े और फ्लूक्स को मारने के लिए ओरीगानो तेल की 1-3 बूंद (जीभ के नीचे या पानी/ज्यूस के साथ) दिन में 3 बार ले सकते हैं। पानी में संक्रमण की संभावना हो तो 1 बूंद तेल डालने से परजीवी जैसे क्रिप्टोस्पोरीडियम और जिआर्डिया मर जाएंगे। सिर की जुएं मारने के लिए साबुन या शैम्पू में तेल की कुछ बूंदें मिला लें। 
वायरल इंफेक्शन – जैसे सर्दी, ज़ुकाम, हरपीज़ जोस्टर, कोल्ड सोर्स (हरपीज़ सिंप्लेक्स), वार्ट, इबोला, हीपेटायटिस आदि। सर्दी, ज़ुकाम के पहले लक्षण दिखते ही ओरीगानो तेल लेने से तुरंत फायदा होता है। 
रोग प्रतिरोधक क्षमता - 
शरीर की इम्यून शक्ति बढ़ाने में ओरीगानो तेल कई बार एकीनेसिया और गोल्डनसील से भी अधिक शक्तिशाली
साबित हुआ है। बस 1-3 बूंद (जीभ के नीचे या पानी/ज्यूस के साथ) दिन में 3 बार ले लीजिए। 
एंटीऑक्सीडेंट – 
रोज लिया जाए तो ओरीगानो तेल का सेवन मुक्त-मूलक क्षति से बचाता है, जीर्णता के असर पर ब्रेक लगाता है। 
ऐलर्जी –
ओरीगानो तेल के सेवन और इसकी भाप लेने से ऐलर्जी में बहुत फ़ायदा होता है। 
मांस-पेशी और जोड़ों के दर्द, प्रदाह और चोट – जैसे खंरोच लगने, त्वचा के कटने, मांस-पेशी की चोट, मोच, बर्साइटिस, टेंडनाइटिस, कार्पल टनल सिंड्रोम, रूमेटिज़्म, शियेटिका आदि। 
पाचन रोग – अपच, भूख न लगना, दस्त लगना, हिचकी, कोलायटिस आदि। 
ओरीगानो तेल पित्त का स्त्राव बढ़ाता है, वायु विकार को शात करता है, जीवाणुरोधी है और प्रदाहरोधी है। 
शक्तिशाली दर्द निवारक – जैसे सिरदर्द, माइग्रेन, नर्वस टेंशन 
फंगस इंफेक्शन – जैसे केंडिडायसिस, थ्रश, वेजाइनायटिस, हाथ और पैरों की अंगुलियों के फंगल इंफेक्शन, ऐथलीट्स फूट, डेंड्रफ, रिंगवर्म, कान का इंफेक्शन 
सिस्टेमिक फंगस संक्रमण – रक्षा-प्रणाली बहुत कमजोर हो जाने के कारण प्रायः कैंसर या एड्स के गंभीर रोगियों में देखने को मिलता है। यह अमूमन जानलेवा हो सकता है और ओरीगानो तेल फंगस संक्रमण को सुरक्षित तरीके से ठीक करने की क्षमता रखता है। 
रोगी को 1-3 बूंद (जीभ के नीचे या पानी/ज्यूस के साथ) दिन में 3 बार दीजिए। रोगी को चीनी और मैदा मत दीजिए, क्योंकि ये फंगस का ख़ास भोजन है। रोज 6-8 ग्लास पानी पीना जरूरी है, ताकि मरे हुए फंगस से निकलनेवाले टॉक्सिन्स का उत्सर्जन सहज हो सके। उपचार आवश्यकतानुसार लंबे समय तक देना पड़ सकता है। मात्रा भी बढ़ानी पड़ेगी। 
नाखून में फंगस संक्रमण – रोज नाखून धोकर साफ करें और तेल लगाएं। लंबे समय तक 1-3 बूंद तेल (जीभ के नीचे या पानी/ज्यूस के साथ) दिन में 3 बार देना पड़ेगा। 
ऐथलीट्स फूट – रोज तेल लगाएं। 
डेंड्रफ (सेबोरिया) – तेल की कुछ बूंदें शैम्पू में मिलाएं और डायल्यूटेड तेल सिर में मलें। 
फूड पॉयज़निंग - 3 बूंद ओरीगानो तेल (जीभ के नीचे या पानी/ज्यूस के साथ) हर घंटे 10 घंटे तक या जब तक रोगी को आराम नहीं मिले तब तक देते रहिए। 
कैंसर - 
ओरीगानो तेल में एंटीकैंसर और एंटीम्यूटेजेनिक गुणों से भरपूर रोजमेरिक एसिड और नरायंगिन तत्व होते हैं। कार्वेक्रोल मल्टी-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक और एंटीइंफ्लेमेटरी है। थायमोल एक तेज़ दर्द-निवारक है। ये सब कैंसर पर मिलकर प्रहार करते हैं। त्वचा के कैंसर पर तेल लगाकर बैंडएड लगाकर रखें। 
उच्च रक्तचाप - ओरीगानो तेल में विद्यमान 7 तत्व रक्तचाप कम करते हैं। 
मसूड़े के रोग, मुंह के छाले और पायरिया – अंगुली से तेल लगाते रहें। 
ओरल हाइजीन और मुंह की दुर्गंध - मुंह की दुर्गंध के लिए टूथब्रश पर टूथपेस्ट के साथ तेल की 1 बूंद डालकर रोज ब्रश करें। सारी दुर्गंध गायब हो जाएगी। दांत और मुंह ताज़ा तथा निर्मल हो जाएगा। 
दांत का दर्द - ओरीगानो तेल दर्द देने वाले कीटाणुओं का सफाया कर देता है। 
यू.टी.आई. – कार्वेक्रोल यूरीनरी ट्रेक्ट इंफेक्शन के कारक जीवाणु ई-कोलाई, प्रोटियस और सूडोमोनास का खातमा कर देता है, इसलिए ओरीगानो तेल यू.टी.आई. बहुत कारगर माना जाता है। 

दो बूंद आरोग्य के लिए – थोड़ा ही कॉफी है 

    ओरीगानो तेल का खालिस तेल बहुत तेज़ और पॉवरफुल होता है। इसलिए इसे प्रायः पतला करके प्रयोग करना चाहिए। पतला करने के लिए जैतून या नारियल के तेल को करियर तेल के रूप में प्रयोग करें। सामान्यतः ओरीगानो तेल और करियर तेल का अनुपात 1:3 रखा जाता है, लेकिन आप 1:3 से 1:15 के बीच कोई भी अनुपात रख सकते हैं। योनि, गुदा और नाजुक जगह पर तेल नहीं लगाएं, तेल जलन करता है। यदि बहुत ही जरूरी हो तो तेल को बहुत पतला करके ही लगाएं। डायल्यूटेड तेल (ओरीगानो तेल 1 हिस्सा और करियर तेल 3 हिस्सा) की सामान्य मात्रा 2-3 बूंद (बच्चों में 1 बूंद) दिन में 2-3 बार है। जीभ के नीचे 2-3 बूंद डालें और 1-2 मिनट बाद सलाइवा में अच्छी तरह मिला कर निगल लें। या इसे आधे ग्लास पानी, ज्यूस अथवा 1 टीस्पून शहद में मिलाकर लें। रोज 6-8 ग्लास पानी पीना जरूरी है, ताकि मरे हुए जीवाणुओं से निकलनेवाले टॉक्सिन्स का उत्सर्जन सहज हो सके। उपचार आवश्यकतानुसार लंबे समय तक देना पड़ सकता है। मात्रा भी बढ़ानी पड़ेगी।

सुरक्षा सूत्र 

    क्या ओरीगानो तेल हमारे लिए पूर्णतः सुरक्षित है? जी हां पतला करके प्रयोग करें तो यह तेल हमारे लिए बिलकुल सुरक्षित है। फिर भी नाजुक जगह पर प्रयोग करने से पहले स्पॉट टेस्ट कर लेना चाहिए। इसके लिए अपनी बांह पर थोड़ा सा पतला किया हुआ तेल लगाएं और देखें कि कोई जलन आदि नहीं हो रही है। 
हमेशा वाइल्ड ओरीगानो तेल (Origanum Vulgare) ही खरीदें। कुछ निर्माता आपको मिलावटी या साधारण अजवान, स्पेनिश ओरीगानो, स्वीट मार्जोरम का तेल भी टिका सकते हैं। याद रखें सिर्फ ओरीगानो वलगेरी का तेल ही काम करता है। सामान्यतः इस तेल को 6 सप्ताह से ज्यादा नहीं लेना चाहिए। इससे आपके शरीर की तेल सोखने की क्षमता तम हो सकती है। यदि आप इसे अधिक समय तक लेना जरूरी समझते हैं, तो 2 सप्ताह का विराम लेकर पुनः शुरू करें। 
     कुछ लोगों इस तेल से अपच या पेट में छोटी मोटी तकलीफ़ हो सकती है। जिन्हें मिंट प्रजाति के पौधों से ऐलर्जी हो, उन्हें भी इस तेल से ऐलर्जी हो सकती है। अतः वह इसे नहीं लें। आमतौर पर शिशुओं और बच्चों में इस तेल प्रयोग नहीं करना चाहिए। गर्भवती स्त्रियों और दुग्धदायिनी माताओं में भी इस तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। 

-------- श्रीमती मृदुला की उपचार यात्रा - कराहने से कहकहे तक -------- 



    श्रीमती मृदुला ठाकुर पत्नी कृष्णपाल सिंह सागर की रहने वाली हैं। इन्हें डेढ़ महीने से कमर और दाएं पैर में बहुत दर्द था। 1 जुलाई से तो दर्द बिलकुल असहनीय हो गया। मृदुला दर्द से कराह रही थी, और चल भी नहीं पा रही थी। सागर के डॉक्टर्स ने इन्हें देखा और दवाइयां दी पर कोई फायदा नहीं हुआ। डॉक्टर्स ने शियेटिका सिंड्रोम बताया। 7 जुलाई को ये दयोदया एक्सप्रेस से कोटा आई। इन्हें व्हील चेयर में बिठाकर बाहर कार तक लाया गया। कोटा के अच्छे चिकित्सक को दिखाया जिन्होंने एम.आर.आई. और एक्स-रे करवाए तथा दवाइयां और इंजेक्शन लिखे। दो दिन तक इन्हें कोई फायदा नहीं हुआ। फिर इन्हें ऑरिगानो तेल (3 बूँद दिन में तीन बार) पिलाया गया और इसी तेल की कमर पर मालिश भी की गई। इस ऑरिगानो तेल के प्रभाव से दो दिन में ही इन्हें सारे दर्द और वेदना से छुटकारा मिल गया और श्रीमती मृदुला 13 जुलाई को मुस्कुराती हुई सागर के लिए रवाना हो गई। यह सारा चमत्कार ऑरिगानो तेल का था। दवाइयां शायद काम नहीं कर सकी।

Wednesday, June 15, 2016

ट्रांस फैट ड्यूएट


ट्रांस फैट ड्यूएट 


           एक दिन मैं ट्रांस फैट पर लेख लिख रहा था। ट्रांस फैट सस्ते तेलों को हाइड्रोजनेट करके फैक्ट्री में बनाया जाता है। सबसे पहले 1911 में प्रोक्टर एंड गैंबल ने इसे क्रिस्को के नाम से बनाया। इंडिया में यह डालडा, रथ या वनस्पति के नाम से आया। उस रात चाय पीते समय मैंने अमित जी की पुरानी ब्लॉक बस्टर फिल्म लावारिस का वो मशहूर गीत (मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है) बजाया। मैं गीत गुगुनाता रहा और ट्रांस फैट पर यह ड्यूएट निकलकर सामने आया। इसमें रेखा जी ट्रांस फैट के रूप में है। इस गीत में अमित जी रेखा (ट्रांस फैट) को कहते हैं कि मेरे इंडिया में तुम जैसी कातिल और जानलेवा फैट का क्या काम है। तुमने मेरे देशवासियों को बहुत बीमार किया है, लाखों लोगों की जान ली है। लेकिन घमंडी और बेशर्म रेखा (ट्रांस फैट) खिसकने के लिए तैयार ही नहीं होता। उसका संपर्क अंबानी और टाटा जैसे बड़े-बड़े उद्योगपतियों से जो है। वह तो अमित जी से यह तक कह देती है कि आपने तो कभी मुझसे प्यार किया है, मेरे साथ फिल्में की हैं, मेरा प्रचार किया है, नन्हें बच्चों को ट्रांस फैट मिली डेयरी मिल्क खिलाई है। अमित जी निरुत्तर जाते हैं और गुस्सें में अपना धैर्य खो बैठते हैं, कहते हैं कि तुमने घी और बटर को व्यर्थ ही बदनाम किया है और उनकी टांग तोड़ने तक की बात कह जाते हैं। 

मेरे इंडिया में क्रिस्को क्या काम है
मेरे इंडिया में ट्रांस फैट क्या काम है
तू है बड़ी कातिल तू ही तो बदनाम है 

ट्रांसफैट मुझको पुकारे दुनिया सारी
वनस्पति मुझको बुलाए दुनिया सारी
तबाही मचाऊं लेती हूँ सबकी जान मैं

अंबानी है मेरा टाटा भी मेरी जान है
रिलायंस मेरा टाटा भी मेरी जान है
मल्टीनेशनल को बनाऊँ धनवान मैं

जोड़ जाम कर दूँ शुगर को भी बढ़ाऊँ मैं
घुटने जाम कर दूँ शुगर को भी बढ़ाऊँ मैं
दिल की धमनियों में मचाऊँ कोहराम मैं

बेकरी में रहती हलवाई भी गुलाम है
समोसा इमरती को तलना मेरा काम है
पिज्ज़ा और बर्गर बनाना मेरा काम है

तुमने भी किया है मेरा एड कुछ ध्यान है
डेयरी मिल्क में भी मिलाया यही माल है
बच्चों को भी तुमने खिलाया ट्रांस फैट है

बटर और घी को क्यों किया बदनाम है
गले को दबा दूँ खींचूंगा तेरी टांग मैं
मुंडी को मरोड़ूँ खींचूंगा तेरी टांग मैं

मेरे इंडिया में क्रिस्को क्या काम है
मेरे इंडिया में ट्रांस फैट क्या काम है
तू है बड़ी कातिल तू ही तो बदनाम है

धुन - मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है




Dr. O.P.Verma
M.B.B.S., M.R.S.H.(London)
7-B-43, Mahaveer Nagar III, Kota Raj. 
+919460816360



Friday, June 10, 2016

नायक नहीं खलनायक हूँ मैं – ट्रांस फैट


जुल्मी बड़ा दुखदायक हूँ मैं 


नायक नहीं खलनायक हूँ मैं – ट्रांस फैट 


         ट्रांस फैट या ट्रांस-अनसेचुरेटेड फैटी एसिड मानव-निर्मित, टॉक्सिक, अखाद्य, और कृत्रिम फैट है। यह एक मृत

और क्षतिग्रस्त अनसेचुरेटेड फैट है, जिसे सस्ते तेलों का आंशिक हाइड्रोजिनेशन करके फैक्ट्री में बनाया जाता है।
प्राकृतिक तेलों और जीव-वसा में प्रायः ट्रांस फैट नहीं होते। यह देखने में घी और मख्खन की तरह दिखता है, इसकी शैल्फ लाइफ बहुत ज्यादा होती है यानि इसमें बने व्यंजन में लंबे समय तक दुर्गंध नहीं आती और इसको बनाने में लागत भी बहुत कम आती है। इसलिए यह बेकरी, हलवाई और प्रोसेस्ड फूड निर्माताओं का पसंदीदा फैट है। सिर्फ प्रोसेस्डरफूड में ही ट्रांसफैट नहीं होते, बल्कि घरों में इस्तेनमाल होने वाले तेल और वनस्पंति घी में भी ट्रांस फैट के मामले में भारत की स्थिति तो बहुत ही खराब है। न ठीक से मानक बनाए गए हैं, न उनकी पालना ठीक से होती है। एक बार सी. एस. ई. ने कुछ कंपनियों के वनस्पति तेलों के सैम्पल्स चैक किए, अधिकांश ब्रांड्स में 5 -12 गुना से भी अधिक ट्रांस फैट पाए गए। 2 दिन तक टी.वी. चेनल्स न्यूज़ दिखाते रहे। उसके बाद “वही ढाक के तीन पात”। ट्रांस फैट को लेकर हमारे देश में शिक्षा और जागरुकता की बहुत कमी है। तो आइए दोस्तों, हम सब मिलकर लोगों को ट्रांस फैट के खतरों से अवगत करवाएं और इसे प्रतिबंधित करवाने के लिए समुचित प्रयास करें।

       ट्रांस फैट के मामले में भारत की स्थिति तो बहुत ही खराब है। न ठीक से मानक बनाए गए हैं, न उनकी पालना ठीक से होती है। एक बार सी. एस. ई. ने कुछ कंपनियों के वनस्पति तेलों के सैम्पल्स चैक किए, अधिकांश ब्रांड्स में 5 - 12 गुना से भी अधिक ट्रांस फैट पाए गए। 2 दिन तक टी.वी. चेनल्स न्यूज़ दिखाते रहे। उसके बाद “वही ढाक के तीन पात”। ट्रांस फैट को लेकर हमारे देश में शिक्षा और जागरुकता की बहुत कमी है। तो आइए दोस्तों, हम सब मिलकर लोगों को ट्रांस फैट के खतरों से अवगत करवाएं और इसे प्रतिबंधित करवाने के लिए समुचित प्रयास करें। 
फैटी एसिड मूलतः एक हाइड्रो-कार्बन की लड़ होती है, जो अनसेचुरेटेड (जिसमें डबल बाँड होते है) या सेचुरेटेड (जिसमें कोई डबल बाँड नहीं होते) हो सकती है। अनसेचुरेटेड फैटी एसिड की लड़ से एक ही तरफ के दो हाइड्रोजन अलग होते हैं, और एक डबल-बांड बनता है। यहाँ लड़ कमजोर पड़ जाने के कारण मुड़ जाती है। मुड़ने से फैटी एसिड के भौतिक और रासायनिक गुण प्रभावित होते हैं। ये सामान्य तापक्रम पर तरल बने रहते हैं। इसे सिस विन्यास कहते हैं। 

        सिस विन्यास के विपरीत ट्रांस फैट में विपरीत दिशा के हाइड्रोजन अलग होते हैं अर्थात एक ऊपर की तरफ का तो दूसरा नीचे की तरफ का। फलस्वरूप फैटी एसिड की लड़ सीधी रहती है और आपस में घनिष्टता से जमी रहती है, इसलिए ये सामान्य तापक्रम पर संतृप्त वसा अम्ल की तरह ठोस रहते हैं। यह असामान्य और अप्राकृतिक विन्यास है। 

हाइड्रोजिनेशन - टेक्नोलोजी की मार, दुनिया हुई बीमार 

         हाइड्रोजिनेशन की प्रक्रिया में केटेलिस्ट निकल धातु की उपस्थिति में तेल को तेज तापक्रम पर गर्म करके भारी दबाव से हाइड्रोजन गैस प्रवाहित की जाती है। इससे तेल ठोस होने लगता है। पूर्ण हाइड्रोजिनेशन करने पर बहुत सख्त और मोम जैसा फैट तैयार होता है। इतना सख्त फैट तलने या बेक करने के लिए उपयुक्त नहीं होता, इसलिए निर्माता हाइड्रोजिनेशन प्रक्रिया को बीच में ही रोक देते हैं और तेल का आंशिक हाइड्रोजिनेशन ही करते हैं। यह बिलकुल बटर की तरह लगता है, सही तापक्रम पर पिघलता है और बेकिंग या तलने के लिए एकदम उपयुक्त होता है। लेकिन आंशिक हाइड्रोजिनेशन की प्रक्रिया में कुछ ट्रांस फैट बन जाते हैं। यहीं से सारी समस्या शुरू होती है। ट्रांस फैट्स का सेवन दिल की धमनियों को अवरुद्ध करता है, हार्ट अटेक का कारक बनता है, कई बीमारियों को दावत देता है और हमारे शरीर को क्रोनिक इन्फ्लेमेशन की भट्टी में झोंक देता है। 

      कुछ स्थितियों में ट्रांस फैट प्राकृतिक फैट्स में भी बन सकते हैं। जैसे मांस और दुग्ध उत्पाद में विद्यमान वेक्सिनिल और कोंजूगेटेड लिनोलिक एसिड में थोडे से ट्रांस फैट बन जाते हैं, लेकिन ये हमारे शरीर को नुकसान नहीं पहुँचाते। कनाडा में हुए शोध के अनुसार बीफ और डेयरी उत्पाद में विद्यमान वेक्सिनिल एसिड एल.डी.एल. कॉलेस्टेरोल और ट्रायग्लीसराइड को कम करते हैं। 

प्रोक्टर एंड गेंबल की जानलेवा सौगात "क्रिस्को" – अब तो खिसको 

        मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी और लाखों-करोडों निर्दोष लोगों के कत्ल की इस घिनौनी कहानी का बीज लगभग एक सदी पहले बोया गया, जब पॉल सेबेटियर को हाइड्रोजिनेशन की तकनीक विकसित करने के उपलक्ष में नोबल पुरस्कार दिया गया। सेबेटियर ने सिर्फ गैस को हाइड्रोजिनेट करने का विज्ञान बनाया, किंतु इससे प्रेरित होकर जर्मनी के रसायनशास्त्री विल्हेम नोरमन ने 1901 में तेल को हाइड्रोजिनेट करने का तरीका बना लिया और 1902 में इसका पेटेंट भी हासिल कर लिया। उस दौर में विलियम प्रोक्टर नाम का एक छोटा सा व्यवसायी साबुन बनाता था और उसका बहनोई जॉर्ज गेंबल मोमबत्तियां बनाकर बेचता था। तब यूरोप के साबुन निर्माता जैतून के तेल से उम्दा साबुन बनाते थे, इसलिए प्रोक्टर के सूअर की चर्बी से बने साबुन की बिक्री कम होती जा रही थी। दूसरी तरफ थोमस एडीसन ने अमेरिका को अपने विद्युत बल्ब की रोशनी से जगमगा दिया था और बेचारे गेंबल की मोमबत्तियां भी नहीं बिक पा रही थी। वक्त की नज़ाकत को समझते हुए दोनों साले-बहनोइयों ने हाथ मिलाया और सिनसिनाटी, ओहियो में प्रोक्टर एंड गेंबल नाम से एक कंपनी बनाई। उन्होंने आनन-फानन में कॉटन सीड के कुछ फार्म खरीदे, नोरमन से हाइड्रोजिनेशन की तकनीक हासिल की और 1911 में कॉटन सीड से क्रिस्को (CRYStalized Cottonseed Oil) के नाम से दुनिया का पहला हाइड्रोजिनेटेड फैट बनाना शुरू किया। बाद में जेनेटिकली मोडीफाइड सोयबीन और सेचुरेटेड पाम ऑयल से क्रिस्को बनने लगा।
William Proctor and George Gamble 
        लेकिन अमेरिका के लोग क्रिस्को को अपनाने में हिचक रहे थे। इसलिए प्रोक्टर एंड गेंबल ने क्रिस्को का खूब प्रचार किया। भ्रामक और झूँठे विज्ञापन तैयार किए गए। क्रिस्को को स्वास्थ्यप्रद, साफ, सस्ता, सुपाच्य, और लार्ड (सूअर की चर्बी से बना फैट) से ज्यादा आधुनिक बतलाया जाने लगा। क्रिस्को में खाना पकाने वाली स्त्रियों को अच्छी पत्नि और मां की संज्ञा दी जाने लगी। उनके घर में अब लार्ड की दुर्गंध नहीं थी और उनके बच्चे चरित्रवान बन रहे थे। प्रोक्टर एंड गेंबल ने एक ही वाक्य से अपने दोनों प्रतिद्वंदियों लार्ड और बटर को हाशिए पर डाल दिया। यहूदियों को आकर्षित करने के लिए तो खासतौर पर लिखा गया कि यहूदी 4000 सालों से क्रिस्कों की प्रतीक्षा कर रहे थे। 

        प्रोक्टर एंड गेंबल ने क्रिस्को की मार्केटिंग में कोई कमी नहीं छोड़ी। पैसा पानी की तरह बहाया गया। क्रिस्को की शैल्फ लाइफ ज्यादा थी तथा बेकिंग और तलने के लिए बटर का सस्ता विकल्प था। इसलिए फास्ट फूड, बेकरी और खाद्य उत्पाद बनाने वाली सभी कंपनियां क्रिस्को का प्रयोग करने लगी। शुरूआत में गृहणियां को बटर छोड़कर क्रिस्कों को अपनाना उचित नहीं लग रहा था। इसलिए उनको लुभाने के लिए प्रोक्टर एंड गेंबल ने रंगीन कुक-बुक्स
बनवाई, जिनमें सभी व्यंजन बनाने में क्रिस्को के प्रयोग की हिदायत दी गई। जगह-जगह वर्क-शॉप किए जाते, क्रिस्को के पैकेट और कुक-बुक्स मुफ्त में बंटवाई जाती। इस तरह धीरे-धीरे पूरी दुनिया को यह घातक फैट खिलाया जाने लगा। हो सकता है तब प्रोक्टर एंड गेंबल को भी पता नहीं हो कि यह ट्रांस फैट मानव जाति का सबसे बड़ा शत्रु साबित होगा। हमारे देश में इसे सबसे पहले डालडा के नाम से बेचा गया। 


       वक्त बीतता गया और धीरे-धीरे ट्रांस फैट ने अपना असर दिखाना शुरू किया। लोग बीमार रहने लगे और चिरकारी प्रदाह (chronic inflammation) के शिकार होने लगे। हृदय रोग, कॉलेस्टेरोल, टाइप-2 डायबिटीज़ और आर्थराइटिस आदि रोगों का आघटन एकदम से बढ़ने लगा। प्रोक्टर एंड गेंबल नहीं चाहती थी कि इसके लिए क्रिस्को को जिम्मेदार माना जाए। इसलिए उन्होंने गुप-चुप तरीके से डॉ. फ्रेड मेटसन की मदद ली। डॉ. मेटसन बहुत बड़े साइंटिस्ट थे और प्रोक्टर एंड गेंबल के हितों के लिए काम करते थे। इन्होंने सरकार की अधूरी लिपिड रिसर्च के क्लिनिकल ट्रायल्स की रिपोर्ट को तोड़-मरोड़ कर जनता के सामने पेश किया, जिसमें यह दर्शाया गया कि हार्ट अटेक और डायबिटीज़ सेचुरेटेड फैट खाने से हो रहे हैं, न कि हाइड्रोजिनेटेड फैट खाने से। डॉ. मेटसन ने एफ.डी.ए. और अमेरिकन हार्ट ऐसोसिएशन के अधिकारियों को खूब पैसा खिलाया। बस फिर क्या था, अमेरिकन हार्ट ऐसोसिएशन भी बटर, घी और सेचुरेटेड फैट्स को ही इन बीमारियों कारण बताने लगे और हाइड्रोजिनेटेड फैट को हृदय-हितैषी साबित करने में जुट गए। 


      लेकिन सच्चाई बिलकुल विपरीत थी। ट्रांस फैट के कारण हृदय रोग, टाइप-2 डायबिटीज़, कैंसर और अन्य क्रोनिक बीमारियां महामारी का रूप ले चुकी थी। जबकि क्रिस्को से पहले इन रोगों का इंसीडेंस बहुत कम था। एक तरफ तो प्रोक्टर एंड गेंबल अपनी सफलता के जश्न मनाती रही, एफ.डी.ए. को मलाई खिलाती रही. दूसरी तरफ हजारों-लाखों निर्दोष लोग बीमार होते रहे, मरते रहे। मानव जाति पर एक बहुत बड़ा अपराध घटित होता रहा। लगभग एक सदी तक मीडिया, एफ.डी.ए. और अमेरिकन हार्ट ऐसोसिएशन ख़ामोश बने रहे, सब कुछ देखते रहे। कोई चाहता ही नहीं था कि लोगों को सच्चाई से अवगत करवाया जाए। चिकित्सक और अध्यापक भी ट्रांस फैट की सही जानकारी नहीं दे रहे थे। 

सीख लो ट्रांस फैट का ज्ञान, बनोगे स्वस्थ और बलवान 

        हमारे स्वास्थ्य के लिए ट्रांस फैट क्यों इतना घातक है? प्राकृतिक और आवश्यक वसा अम्ल (EFAs) और इन
खराब ट्रांस फैट्स की कार्य-प्रणाली में क्या अंतर है? इन सारी बातों को गहराई से समझने के लिए आपको डॉ. जॉहाना बडविग द्वारा किए गए शोध को जानना जरूरी है। डॉ. बडविग जर्मनी के फेडरल इंस्टिट्यूट ऑफ फैट्स एंड ड्रग्स विभाग की चीफ एक्सपर्ट थीं। उन्हें ओमेगा-3 लेडी के नाम से जाना जाता है। डॉ. बडविग ने पहली बार ओमेगा-3 फैट (अल्फा-लिनेलोनिक एसिड) की संरचना और कार्य-प्रणाली का गहन अध्ययन किया और सिद्ध किया कि स्वस्थ और निरोग शरीर के लिए अल्फा-लिनेलोनिक एसिड की भूमिका सबसे अहम है। उन्होंने यह भी साबित किया कि ट्रांस फैट मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। आज भी ओमेगा-3 फैट्स पर रिसर्च जारी है, लेकिन बडविग की शोध के बारे में चर्चा नहीं होती। यह हम सबके लिए दुर्भाग्य की बात है। पता नहीं क्यों मीडिया और अनुसंधानकर्ता बडविग के विज्ञान पर क्यों ख़ामोश हो जाते हैं। 

       1949 में डॉ. बडविग ने फैट को पहचानने के लिए पेपर क्रोमेटोग्राफी तकनीक विकसित की। इस तकनीक द्वारा उन्होंने पहली बार अनसेचुरेटेड और वाइटल आवश्यक वसा अम्ल (EFAs) - सिस अल्फा-लिनेलोनिक एसिड और सिस लिनोलिक एसिड को पृथक किया, और संरचना का विस्तृत अध्ययन किया। सिस विन्यास में एक ही तरफ के हाइड्रोजन अलग होते हैं और डबल बाँड बनता है। यहाँ चेन कमजोर पड़ जाने के कारण मुड़ जाती है। सबसे खास बात यह है कि इस मोड़ में नेगेटिवली चार्ज्ड ढेर सारे ऊर्जावान इलेक्ट्रोन्स इकट्ठे हो जाते हैं। ये इलेक्ट्रोन्स हल्के और स्वच्छंद होने के कारण ऊपर उठकर बादल की तरह तैरते हुए दिखाई देते हैं, इसलिए इन्हें पाई-इलेक्ट्रोन्स या इलेक्ट्रोन क्लाउड की संज्ञा दी गई है। पाई-इलेक्ट्रोन्स का एक इलेक्ट्रोमेगनेटिक फील्ड बनता है, जो ऑक्सीजन को आकर्षित करता है और कोशिका की भित्ति में प्रोटीन के साथ बंधन बनाकर अवस्थित रखता है। ये पाई-इलेक्ट्रोन्स शरीर में ऊर्जा या जीवन-ऊर्जा या आत्मा के प्रवाह के लिए बहुत जरूरी माने गए हैं। कोशिका की भित्ति में अवस्थित पाई-इलेक्ट्रोन्स रिज़ोनेंस के द्वारा सूर्य के इलेक्ट्रोन्स को आकर्षित और संचित करते हैं। क्वांटम फिजिक्स की गणनाओं के अनुसार सूर्य के इलेक्ट्रोन्स का सबसे अधिक संचय मानुष ("human") करता है। मानुष हमेशा स्वस्थ जीवन जीता है और भविष्य की तरफ अग्रसर रहता है। अमानुष "anti-human" की भी परिकल्पना की गई है। मानुष के विपरीत अमानुष में पाई-इलेक्ट्रोन्स बहुत कम होते हैं, वह हमेशा भूतकाल की तरफ बढ़ता है। उसकी जीवन क्रियाएं और सोच भी शिथिल रहती है, उसमें ऊर्जा और ताकत नहीं होती क्योंकि उसमें सूर्य के इलेक्ट्रोन्स के साथ स्पंदन करते पाई-इलेक्ट्रोन्स अनुपस्थित रहते हैं। ट्रांस फैट में पाई-इलेक्ट्रोन्स अनुपस्थित होने के कारण मनुष्य रोग, गर्त, और मृत्यु की तरफ बढ़ता है। बडविग ने हमेशा इन कातिल ट्रांस फैट्स को मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन बताया और सबूतों के साथ इसको प्रतिबंधित करने की सलाह दी। लेकिन किसी ने ध्यान ही नहीं दिया अन्यथा आज दुनिया का स्वरूप कुछ और ही होता। 



        मैंने गर्म और उबलते तेल में ट्रांस फैट के कणों को देखा है। इनमें अनसेचुर्टेड डबल बाँड भी थे, परंतु ऊर्जावान पाई-इलेक्ट्रोन्स नहीं थे और ये हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध हुए। 
- डॉ. जॉहाना बडविग 

ट्रांस फैट के खतरे 

      ट्रांस फैट में ऊर्जावान पाई-इलेक्ट्रोन्स नहीं होने से कोशिका की भित्तियां ऑक्सीजन को आकर्षित करने की क्षमता तथा कोमलता और तरलता खो बैठती है, कोशिका में ऊर्जा का निर्माण बाधित होता है। ट्रांस फैट आवश्यक वसा अम्ल की कार्य-प्रणाली में व्यवधान पैदा करते हैं, बुरे कॉलेस्टेरोल का स्तर बढ़ाते है, और शरीर की रक्षा-प्रणाली को कमजोर बनाते हैं। ट्रांस फैट पहली और तीसरी श्रेणी के प्रदाहरोधी (Anti-inflammatory) प्रोस्टाग्लेंडिन्स का स्त्राव भी कम करते हैं, जिससे शरीर क्रोनिक इन्फ्लेमेशन का शिकार हो जाता है और कई बीमारियों का कारक बनता है। जैसे 
1. कैंसर
2. हृदय रोग, हार्ट अटेक 
3. टाइप-2 डायबिटीज
4. आर्थराइटिस
5. अस्थमा
6. डिप्रेशन 

मुझसे बचकर कहाँ जाओगे 

1. बाजार में मिलने वाले सभी तरह के बिस्किट्स, चाकलेट्स, कैडी, केक, पेस्ट्री, ब्रेड, टोस्ट, पिज्ज़ा, बर्गर तथा सभी बेकरी उत्पादों में भरपूर ट्रांस फैट होता है। 
2. बाजार में उपलब्ध सभी भारतीय व्यंजन जैसे समोसा. कचौड़ी, चाट-पकौड़े, छोले-भटूरे, सभी तरह के नमकीन और मिठाइयों में भरपूर ट्रांस फैट होता है। 
3. सभी स्नेक-फूड जैसे आलू के चिप्स, फ्रैंच फ्राइज़, इंस्टेंट नूडल्स आदि में भरपूर ट्रांस फैट होता है। 
4. वनस्पति और आंशिक हाइड्रोजिनेटेड रिफाइंड तेल में भरपूर ट्रांस फैट होते हैं। 
5. रसोई में अनस्चुरेटेड तेल को गर्म करने पर भी ट्रांस फैट बनते है। इसलिए समझदार ग्रहणियां तलने के लिए सेचुरेटेड फैट का प्रयोग करती हैं।

एफ.डी.ए. का यू-टर्न, खबर बड़ी है गर्म 

         लंबे समय से लोगों, संस्थाओं, और अनुसंधानकर्ताओं के भारी दबाव के बाद एफ.डी.ए. ने आखिरकार मान लिया है कि किसी भी मात्रा में ट्रांस फैट का सेवन हमारे लिए सुरक्षित नहीं है और इसे “generally recognized as safe” श्रेणी से हटा दिया है। जबकि कुछ ही समय पहले तक एफ.डी.ए. ट्रांस फैट को मनुष्य के लिए सुरक्षित बतलाता रहा है और हार्ट अटेक, डायबिटीज, आर्थराइटिस के बढ़ते आघटन के लिए सेचुरेटेड फैट को जिम्मेदार मानता रहा। 

       ट्रांस फैट को प्रतिबंधित करने में डेनमार्क सबसे आगे रहा है। डेनमार्क ने मार्च, 2003 में हर उस खाद्य-पदार्थ की बिक्री पर पाबंदी लगा दी है, जिसमे 2 प्रतिशत से अधिक ट्रांस फैट हो। इस कानून के बनने से लोगों के आहार में ट्रांस फैट की मात्रा घटकर 1 ग्राम प्रति दिन हो गई है। बाद में कनाडा और स्विटज़रलैंड ने भी इसी तरह के कानून बनाए।

        5 दिसंबर, 2006 में न्यूयॉर्क ते बोर्ड ऑफ हैल्थ ने शहर के सारे रेस्टॉरेंट्स में ट्रांस फैट को प्रतिबंधित करने का निर्णय लिया, जिसे जून, 2008 से लागू किया गया।

        2013 में एफ.डी.ए. ने सभी खाद्य-पदार्थों से ट्रांस फैट्स को हटाने की घोषणा की। जून, 2015 में आखिरी चेतावनी जारी कर दी गई कि तीन साल के अंदर हर खाद्य-पदार्थ से ट्रांस फैट पूरी तरह हटा लिया जाए। एफ.डी.ए. कहता है कि इससे खाद्य उद्योग पर अगले बीस वर्षों में 6.2 बिलियन डॉलर का खर्चा आएगा। खाद्य उद्योग को नए
Prof. Fred Kummerow
तौर-तरीके और तकनीक विकसित करनी होगी। यह डॉ. बडविग और प्रोफेसर कमेरो समेत उन सभी लोगों, संस्थाओं और अनुसंधानकर्ताओं की बहुत बड़ी जीत है, जो ट्रांस फैट को प्रतिबंधित करवाना चाहते थे। यह सचमुच उत्सव मनाने का समय है। स्वर्ग में बैठी बडविग भी आज मुस्कुरा रही होंगी। इलिनॉइस यूनीवर्सिटी के 100 वर्षीय प्रोफेसर फ्रेड कमेरो लंबे समय से ट्रांस फैट को प्रतिबंधित करवाने के लिए 6 दशकों से प्रयासरत थे। 2009 में इन्होंने एफ.डी.ए. के खिलाफ एक पिटीशन भी फाइल किया था। 

        ट्रांस फैट के मामले में भारत की स्थिति तो बहुत ही खराब है। न ठीक से मानक बनाए गए हैं, न उनकी पालना ठीक से होती है। एक बार सी. एस. ई. ने कुछ कंपनियों के वनस्पति तेलों के सैम्पल्स चैक किए, अधिकांश ब्रांड्स में 5 -12 गुना से भी अधिक ट्रांस फैट पाए गए। 2 दिन तक टी.वी. चेनल्स न्यूज़ दिखाते रहे। उसके बाद “वही ढाक के तीन पात”। ट्रांस फैट को लेकर हमारे देश में शिक्षा और जागरुकता की बहुत कमी है। तो आइए दोस्तों, हम सब मिलकर लोगों को ट्रांस फैट के खतरों से अवगत करवाएं और इसे प्रतिबंधित करवाने के लिए समुचित प्रयास करें। 

ट्रांस फैट के बाद… क्या? 

         ट्रांस फैट प्रतिबंधित होने के बाद खाद्य-उद्योग कौन से फैट का प्रयोग करेंगे? मंहगे और अच्छे फैट तो ये काम में लेने से रहे। काम तो इन्हें सस्ता सोयबीन और पॉम ऑयल ही लेना है। पतली गलियों से कुछ ऐसी सूचनाएं मिल रही हैं कि ये लोग इंटरएस्टेरीफाइड फैट का प्रयोग कर सकते हैं। इंटरएस्टेरीफिकेशन की प्रक्रिया में एक ट्रायग्लीसराइड अणु से फैटी एसिड निकाल कर दूसरे ट्रायग्लीसराइड अणु से चिपका दिया जाता है। इससे फैट ठोस होने लगता है, शैल्फ लाइफ बढ़ जाती है, तलने तथा बेकिंग के लिए उपयुक्त रहता है और ट्रांस फैट भी नहीं बनते। लेकिन यह भी अप्राकृतिक फैट है और शुरूआती शोध के अनुसार इसके प्रयोग से ब्लड शुगर बढ़ती है और अच्छा एच.डी.एल. कॉलेस्टेरोल कम होता है।